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Thursday, November 25, 2010

[GarjaMaharashtraMaza] ताजमहल...........एक छुपा हुआ सत्य..........

 



---------- Forwarded message ----------
From: dipesh mestri <dipeshmestri4u@gmail.com>
Date: 2010/11/25
Subject: मराठी युवा // Fwd: ताजमहल...........एक छुपा हुआ सत्य..........
To: mannmajhe@googlegroups.com, marathiyuva@googlegroups.com




 
 

बी.बी.सी. कहता है...........
ताजमहल...........
एक छुपा हुआ सत्य..........
कभी मत कहो कि.........
यह एक मकबरा है..........

 


ताजमहल का आकाशीय दृश्य......



cid:part1.00050203.06090602@oracle.com

आतंरिक पानी का कुंवा............
cid:part2.06030804.06010503@oracle.com 
ताजमहल और गुम्बद के सामने का दृश्य cid:part3.09080704.08060501@oracle.com
गुम्बद और शिखर के पास का दृश्य.....
cid:part4.00030907.06080709@oracle.com 
शिखर के ठीक पास का दृश्य.........cid:part5.03000607.02030403@oracle.com  
आँगन में शिखर के छायाचित्र कि बनावट.....
cid:part6.05060808.06040700@oracle.com 
प्रवेश द्वार पर बने लाल कमल........cid:part7.04050901.06080907@oracle.com  
ताज के पिछले हिस्से का दृश्य और बाइस कमरों का समूह........cid:part8.08080100.03070300@oracle.com  
पीछे की खिड़कियाँ और बंद दरवाजों का दृश्य........cid:part9.01040608.06050105@oracle.com  
विशेषतः वैदिक शैली मे निर्मित गलियारा.....cid:part10.09070103.01050702@oracle.com  
मकबरे के पास संगीतालय........एक विरोधाभास.........
cid:part11.09090907.02060108@oracle.com 
ऊपरी तल पर स्थित एक बंद कमरा.........

cid:part12.06040805.05030906@oracle.com 
निचले तल पर स्थित संगमरमरी कमरों का समूह.........
cid:part13.07080501.08010005@oracle.com 
दीवारों पर बने हुए फूल......जिनमे छुपा हुआ है ओम् ( ॐ ) ....
cid:part14.06040703.01080607@oracle.com 
निचले तल पर जाने के लिए सीढियां........
cid:part15.06000608.05080409@oracle.com 
कमरों के मध्य 300फीट लंबा गलियारा..cid:part16.05080508.04010801@oracle.com  
निचले तल के२२गुप्त कमरों मे सेएककमरा...cid:part17.07030700.04030709@oracle.com  
२२ गुप्त कमरों में से एक कमरे का आतंरिक दृश्य.......

cid:part18.09000803.06080003@oracle.com  

अन्य बंद कमरों में से एक आतंरिक दृश्य..   cid:part19.05050106.09010306@oracle.com 
एक बंद कमरे की वैदिक शैली में
निर्मित छत......
cid:part20.09030504.02030904@oracle.com 
ईंटों से बंद किया गया विशाल रोशनदान .....

cid:part21.09040606.07000907@oracle.com 
दरवाजों में लगी गुप्त दीवार,जिससे अन्य कमरों का सम्पर्क था.....
cid:part22.03030105.09010503@oracle.com 
बहुत से साक्ष्यों को छुपाने के लिए,गुप्त ईंटों से बंद किया गया दरवाजा......

cid:part23.03050306.09070004@oracle.com 
बुरहानपुर मध्य प्रदेश मे स्थित महल जहाँ मुमताज-उल-ज़मानी कि मृत्यु हुई थी.......

cid:part24.00070208.06030602@oracle.com 
बादशाह नामा के अनुसार,, इस स्थान पर मुमताज को दफनाया गया......... cid:part25.05090007.00040404@oracle.com


 

 

अब कृपया  इसे पढ़ें .........


प्रो.पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि........


"ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था"


प्रो.ओक. अपनी पुस्तक "TAJ MAHAL - THE TRUE STORY" द्वारा इस

बात में विश्वास रखते हैं कि,--

 

सारा विश्व इस धोखे में है कि खूबसूरत इमारत ताजमहल को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था.....


 

ओक कहते हैं कि......


ताजमहल प्रारम्भ से ही बेगम मुमताज का मकबरा न होकर,एक हिंदू प्राचीन शिव मन्दिर है जिसे तब तेजो महालय कहा जाता था.


 

अपने अनुसंधान के दौरान ओक ने खोजा कि इस शिव मन्दिर को शाहजहाँ ने जयपुर के महाराज जयसिंह से अवैध तरीके से छीन लिया था और इस पर अपना कब्ज़ा कर लिया था,,

 

=>शाहजहाँ के दरबारी लेखक "मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी "ने अपने "बादशाहनामा" में मुग़ल शासक बादशाह का सम्पूर्ण वृतांत 1000  से ज़्यादा पृष्ठों मे लिखा है,,जिसके खंड एक के पृष्ठ 402 और 403 पर इस बात का उल्लेख है कि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज-उल-ज़मानी जिसे मृत्यु के बाद, बुरहानपुर मध्य प्रदेश में अस्थाई तौर पर दफना दिया गया था और इसके ०६ माह बाद,तारीख़ 15 ज़मदी-उल- अउवल दिन शुक्रवार,को अकबराबाद आगरा लाया गया फ़िर उसे महाराजा जयसिंह से लिए गए,आगरा में स्थित एक असाधारण रूप से सुंदर और शानदार भवन (इमारते आलीशान) मे पुनः दफनाया गया,लाहौरी के अनुसार राजा जयसिंह अपने पुरखों कि इस आली मंजिल से बेहद प्यार करते थे ,पर बादशाह के दबाव मे वह इसे देने के लिए तैयार हो गए थे.

 

इस बात कि पुष्टि के लिए यहाँ ये बताना अत्यन्त आवश्यक है कि जयपुर के पूर्व महाराज के गुप्त संग्रह में वे दोनो आदेश अभी तक रक्खे हुए हैं जो शाहजहाँ द्वारा ताज भवन समर्पित करने के लिए राजा
जयसिंह को दिए गए थे.......

 

=>यह सभी जानते हैं कि मुस्लिम शासकों के समय प्रायः मृत दरबारियों और राजघरानों के लोगों को दफनाने के लिए, छीनकर कब्जे में लिए गए मंदिरों और भवनों का प्रयोग किया जाता था ,

उदाहरनार्थ हुमायूँ, अकबर, एतमाउददौला और सफदर जंग ऐसे ही भवनों मे दफनाये गए हैं ....

 

=>प्रो. ओक कि खोज ताजमहल के नाम से प्रारम्भ होती है---------

 

="महल" शब्द, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में
भवनों के लिए प्रयोग नही किया जाता...

यहाँ यह व्याख्या करना कि महल शब्द मुमताज महल से लिया गया है......वह कम से कम दो प्रकार से तर्कहीन है---------


पहला -----शाहजहाँ कि पत्नी का नाम मुमताज महल कभी नही था,,,बल्कि उसका नाम मुमताज-उल-ज़मानी था ...


और दूसरा-----किसी भवन का नामकरण किसी महिला के नाम के आधार पर रखने के लिए केवल अन्तिम आधे भाग (ताज)का ही प्रयोग किया जाए और प्रथम अर्ध भाग (मुम) को छोड़ दिया जाए,,,यह समझ से परे है...

 

प्रो.ओक दावा करते हैं कि,ताजमहल नाम तेजो महालय (भगवान शिव का महल) का बिगड़ा हुआ संस्करण है, साथ ही साथ ओक कहते हैं कि----

मुमताज और शाहजहाँ कि प्रेम कहानी,चापलूस इतिहासकारों की भयंकर भूल और लापरवाह पुरातत्वविदों की सफ़ाई से स्वयं गढ़ी गई कोरी अफवाह मात्र है क्योंकि शाहजहाँ के समय का कम से कम एक शासकीय अभिलेख इस प्रेम कहानी की पुष्टि नही करता है.....

 


 

इसके अतिरिक्त बहुत से प्रमाण ओक के कथन का प्रत्यक्षतः समर्थन कर रहे हैं......
तेजो महालय (ताजमहल) मुग़ल बादशाह के युग से पहले बना था और यह भगवान् शिव को समर्पित था तथा आगरा के राजपूतों द्वारा पूजा जाता था-----


 ==>न्यूयार्क के पुरातत्वविद प्रो. मर्विन मिलर ने ताज के यमुना की तरफ़ के दरवाजे की लकड़ी की कार्बन डेटिंग के आधार पर 1985 में यह सिद्ध किया कि यह दरवाजा सन् 1359 के आसपास अर्थात् शाहजहाँ के काल से लगभग 300 वर्ष पुराना है...


 

==>मुमताज कि मृत्यु जिस वर्ष (1631) में हुई थी उसी वर्ष के अंग्रेज भ्रमण कर्ता पीटर मुंडी का लेख भी इसका समर्थन करता है कि ताजमहल मुग़ल बादशाह के पहले का एक अति महत्वपूर्ण भवन था......


 

==>यूरोपियन यात्री जॉन अल्बर्ट मैनडेल्स्लो ने सन् 1638 (मुमताज कि मृत्यु के 07 साल बाद) में आगरा भ्रमण किया और इस शहर के सम्पूर्ण जीवन वृत्तांत का वर्णन किया,,परन्तु उसने ताज के बनने का कोई भी सन्दर्भ नही प्रस्तुत किया,जबकि भ्रांतियों मे यह कहा जाता है कि ताज का निर्माण कार्य 1631 से 1651 तक जोर शोर से चल रहा था......


 

==>फ्रांसीसी यात्री फविक्स बर्निअर एम.डी. जो औरंगजेब द्वारा गद्दीनशीन होने के समय भारत आया था और लगभग दस साल यहाँ रहा,के लिखित विवरण से पता चलता है कि,औरंगजेब के शासन के समय यह झूठ फैलाया जाना शुरू किया गया कि ताजमहल शाहजहाँ ने बनवाया था.......


 

प्रो. ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगताओं को इंगित करते हैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि,ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है....... 


आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं,जो आम जनता की पहुँच से परे हैं 


प्रो. ओक., जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं.......

 

==>ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल के अन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है,, यदि यह सत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नही टपकाया जाता,जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँद कर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँद बूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब....????

 

 

राजनीतिक भर्त्सना के डर से इंदिरा सरकार ने ओक की सभी पुस्तकें स्टोर्स से वापस ले लीं थीं और इन पुस्तकों के प्रथम संस्करण को छापने वाले संपादकों को भयंकर परिणाम भुगत लेने की धमकियां भी दी गईं थीं....


 
प्रो. पी. एन. ओक के अनुसंधान को ग़लत या सिद्ध करने का केवल एक ही रास्ता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार बंद कमरों को संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में खुलवाए, और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को छानबीन करने दे ....

 

 

ज़रा सोचिये....!!!!!!


 

कि यदि ओक का अनुसंधान पूर्णतयः सत्य है तो किसी देशी राजा के बनवाए गए संगमरमरी आकर्षण वाले खूबसूरत,शानदार एवं विश्व के महान आश्चर्यों में से एक भवन, "तेजो महालय" को बनवाने का श्रेय बाहर से आए मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को क्यों......?????  

तथा......

l

इससे जुड़ी तमाम यादों का सम्बन्ध मुमताज-उल-ज़मानी से क्यों........???? ???

 

 

आंसू टपक रहे हैं, हवेली के बाम से,,,,,,,,
रूहें लिपट के रोटी हैं हर खासों आम से.....
अपनों ने बुना था हमें,कुदरत के काम से,,,,
 

फ़िर भी यहाँ जिंदा हैं हम गैरों के नाम से...... 


 

"कृपया इस संदेश को सभी को भेजें




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Thursday, November 18, 2010

{Marathi Kavita Mandal} *२५ हजार व्होल्टचा मृत्यू..सर्वाचेच डोळे उघडणारा!*

 




To: ALL MY DEAR FRIENDS 

 *२५ हजार व्होल्टचा मृत्यू..सर्वाचेच डोळे उघडणारा!*

मोबाईल फोन व डिजिटल कॅमेरा यासारख्या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणांचाचा कुठे आणि कसा
वापर करू नये याविषयी दिल्या जाणाऱ्या सूचनांकडे आपण सर्वच जण 'चलता है' अशा
बेफिकीर वृत्तीने दुर्लक्ष करतो. पण आदित्य सुरेश जोशी या पुण्यातील १९
वर्षांच्या मुलाचा अलीकडेच झालेला मृत्यू अशी बेफिकीरी कशी प्राणघातक ठरू शकते
याबद्दल आपणा सर्वाचाच डोळे उघडणारा आहे.
अभियांत्रिकी महाविद्यालयात पहिल्या वर्षांत शिकणारा आदित्य सप्टेंबरच्या
शेवटच्या आठवडय़ात त्याच्या कॉलेजच्या 'स्टडी टूर'साठी अमरावती येथे गेला
होता. २५सप्टेंबरच्या
सकाळी त्याचे सर्व सहाध्यायी व शिक्षक 'स्टडी टूर' संपवून मुंबईला परत
येण्यासाठी बडनेरा रेल्वे स्टेशनवर आले. गाडीची वाट पाहात थांबले असता अनेक
विद्यार्थ्यांनी आपापल्या मोबाईल फोनने किंवा डिजिटल कॅमेऱ्याने एकमेकाचे व
ग्रुप फोटो काढण्यास सुरुवात केली. सर्व ग्रुप कॅमेऱ्याच्या फ्रेममध्ये येत
नाहीत व फोटोसाठी 'अँगल'ही नीट मिळत नसल्याची अडचण त्यांच्यापैकी फोटो
काढणाऱ्या एका विद्यार्थ्यांने मांडली. एकाने सूचविले की, गाडीच्या डब्यावर
चढून त्या वरच्या 'अँगल'ने फोटो काढला तर फ्रेममध्ये सर्वजण व्यवस्थित सामावू
शकतील. मित्राने केलेल्या सूचनेप्रमाणे आदित्य चांगला फोटो काढता यावा यासाठी
डिजिटल कॅमेरा घेऊन समोरच्या मालगाडीच्या एका तेलाच्या टँकरवर चढला. त्याच्या
डोक्याच्या वर काही फुटांवर २५ हजार व्होल्टचा विद्युतप्रवाह वाहून नेणारी
रेल्वेची 'ओव्हरहेड वायर' होती. आदित्यने कॅमेऱ्याचा फ्लॅश मारताच 'ओव्हरहेड
वायर'मधील विजेचा प्रवाह त्याच्या कॅमेऱ्यात व त्यातून त्याच्या शरीरात
शिरला. वीजेच्या
एवढया उच्च दाबाच्या झटक्याने आदित्य क्षणार्धात अर्धवट जळलेल्या स्थितीत
तेलाच्या टँकरवरून खाली फेकला गेला. अचानक घडलेल्या या प्रकाराने आदित्यचे
सहाध्यायी व शिक्षक बिथरून गले. त्यावेळी आदित्यचे वडिल बँकॉकमध्ये होते. अनेकांना
तात्काळ मोबाईलवरून फोन व 'एसएमएस' केल्यानंतर आदित्यच्या वडिलांच्या पुण्यातील
मित्रांनी 'एअर अ‍ॅम्ब्युलन्स'ची व्यवस्था केली. आदित्यला मुंबईच्या केशवानी
इस्पितळात दाखल केले गेले. डॉक्टरांनी प्रयत्नांची शिकस्त केली पण २८ सप्टेंबर
रोजी आदित्यचा दुर्दैवी मृत्यू झाला.
*पेट्रोल पंपावर मोबाईल फोनचा वापर कर नका. मोबाईल चार्जिगला लावलला असताना
त्याच्यावर बोलू नका. उच्च दाबाच्या वीजेच्या तारा जेथून जात असतील अशा ठिकाणी
मोबाईल किंवा फ्लॅशलाईटचा वापर करू नका. विमान आकाशात असताना मोबाईल व
कॅमेऱ्याचे फ्लॅश वापरू नका. रात्री झोपताना अंथरुणाजवळ मोबाईल फोन चार्ज करत
ठेवू नका. अशा सूचना आपण सर्वजण वाचतो. पण बहुतांश प्रत्यक्षात त्याचे पालन
करीत नाहीत. यामुळे आपल्यापैकी कोणाच्याही नशिबी घातक क्षण केव्हाही येऊ शकतो
याची प्रकर्षांने जाणीव करून देणारी आदित्यच्या मृत्यूची ही घटना.
*हे का घडले? घटनेमागचे विज्ञान..
हायटेन्शन वायर्सच्या परिघामध्ये मोठय़ा प्रमाणावर अधिक तीव्रतेचे विद्युत- चुंबकीय
क्षेत्र असते. या क्षेत्रामुळे जवळच्या गोष्टींवरती मोठा विद्युतभार प्रवर्तित
होऊ शकतो, असे सांगून होमी भाभा विज्ञान शिक्षण संस्थेचे संचालक डॉ. हेमचंद्र
प्रधान म्हणाले की, धातूची व बोथट आकाराची वस्तू असेल तर मोठा विद्युतभार
जमिनीकडे वाहून नेला जाऊ शकतो. तो भार जमिनीपर्यंत पोहोचला की, विद्युत मंडळ
पूर्ण होते व विजेचा मोठा धक्का बसतो, ज्यात प्राणावर बेतू शकते. या
घटनेमध्येदेखील असेच झालेले असावे. त्या विद्यार्थ्यांने क्लिक केले त्यावेळेस
ते विद्युतमंडळ पूर्ण झाले. फ्लॅशचा या घटनेशी कोणताही संबंध नसावा. हा
विद्यार्थी आणि धातूची असलेली बोगी यामध्ये काही लाकडी वस्तू असती तर विद्युत
मंडळ पूर्ण होण्यात अडथळा निर्माण झाला असता आणि अनर्थ टळला असता, असेही
डॉ. प्रधान
म्हणाले.



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Wednesday, November 17, 2010

[GarjaMaharashtraMaza] Thought Breaker A NICE STORY [1 Attachment]

 

[Attachment(s) from www.maheshbhoir.tk included below]

Best Regards,

Mahesh Bhoir
www.agrizatka.tk
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+91 9870560065

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[GarjaMaharashtraMaza] *वाचा आणि विचार करा.....जरूर करा.....हीच काळाची गरज आहे.........*

 



नमस्कार श्रीमंत हो.....** ** *

 * *
 *
वाचा आणि विचार करा.....जरूर करा.....हीच काळाची गरज आहे.........*
 * *


 
गुढीपाडवा म्हणजेच छत्रपति संभाजी महाराज पुण्यतिथी.

 
पाडवा. हिंदुं नववर्ष दिन. या दिवशी हिंदु घरोघरी गुढ्या उभारतात. त्याची 'याद'
 
मनात ठेऊन औरंगजेबाने आजची संध्याकाळ निवडली होती. की उद्या पहाटे या हिंदुंना
 -
काफरांना त्यांच्या प्राणाहून प्रिय असणार्‍या राजाच्या मस्तकाचीच गुढी -
 
भाल्यावर टांगवून मिरवून दाखवू.

 
बहादुरगडावर (मौजे पेडगाव, ता.श्रीगोंदा) संभाजी महाराजांची धिंड काढलेली होती.
 
एका बोडख्या घाणेरड्या उंटावर संभाजी महाराजांना व कवि कलशांना उलटे बसवले
 
होते. साखळदंडाने बांधलेले. त्या दोघांच्या अंगावर विदुशकासारखे झिरमिळ्यांचे
 
चट्ट्यापट्टयाचे कपडे चढवलेले होते. गळ्यातील शिवरायांनी चढवलेली कवड्याची माळ
 
उतरवून गुरांनाही सहन होणार नाही अशी काथ्याची पेंढी बांधलेली होती.
 
दोघांच्याही डोक्यावर एखाद्या अट्टल गुन्हेगारांना बांधाव्यात अशा, कुराणमध्ये
 
सांगितलेल्या आदेशानूसार इराणी लाकडी टोप्या बसवलेल्या होत्या. त्याच प्रमाणे
 '
तख्तेकुलाह' म्हणजे लाकडी फळ्यांचा खोडा मानेवर ठेऊन त्याला दोन्ही हात
 
बांधलेले होते. त्या खोड्याला घुंगरे बांधलेली होती अन् त्यावर छोटी छोटी
 
निशाणे चितारलेली होती.
 
अशी ती धिंड मोगली फौजेमधून काढलेली होती. मोगलांमध्ये ईदपेक्षाही उत्साहाचे
 
वातावरण होते. दुतर्फा फौजेतील सैनीक महाराजांवर व कवी कलशांवर दगडे भिरकावीत
 
होते. त्यांना भाल्याने टोचीत होते. त्यांचे नगारे वाजत होते, कर्णे थरारत
 
होते. बारा ईमामांचे झेंडे फडकत होते. रायगडचा राजा, महाराजांचा व जीजाआऊचा
 
शंभूबाळ आज रांडा पोरांच्या विटंबनेचा विषय झालेला होता.

 
पुढे औरंगजेबाने आपला मुक्काम तुळापूर येथे हालवला. इथे तुळापूरच्या संगमावर
 
त्याला "हिंदू राजास" हलाल करावयाचे होते. संभाजी महाराजांची तेजस्वी नेत्रकमले
 
काढण्यासाठी हशम सरसावले. रांजणातून रवी जशी फिरवावी, तशा त्या तप्त - लालजर्द
 
सळया शंभू राजांच्या डोळ्यातून फिरल्या. चर्र चर्र आवाज करीत चर्येवरील कातडी
 
होरपळून गेली. सारी छावणी थरारली पण संभाजी महाराजांच्या मुखातून आक्रोशाची
 
लकेरही उमटली नाही.. यामुळे औरंगजेबाचा पारा मात्र जास्तच चढला. कवि कलशाचेही
 
डोळे काढण्यात आले.

 
बलिष्ठ शरीर यष्टीचा एक पठाण कविराजांच्या छातीवर बसला. दोघांनी त्यांचे पाय
 
उसाचे कांडे पिळगटावे तसे मागे खेचले. दोघांनी आपल्या राकट हातांनी कविराजांची
 
मुंडी धरली. त्या पठाणाने कविराजांच्या जबड्यात हात घातला. कविराजांचे मुख
 
रक्ताने भरून गेले. त्या धटींगणाने कविराजांची जीभ हाताने बाहेर खसकन खेचली.
 
एकाने ती वीतभर लांब बाहेर आलेली जीभ कट्यारीने खचकन छाटली. कविराजांच्या
 
तोंडातून रक्ताचा डोंब उबळला. संभाजी महाराजांचीही जीव्हा अशीच छाटली गेली.
 
पहाणार्‍यांचेही डोळे पांढरे पडले. असूरी आनंदाने आवघी छावणी गर्जत होती.

 
कवी कलशांवर होणारे अत्याचार ही जणू संभाजी महाराजांवर होणार्‍या अत्याचारांची
 
रंगीत तालीमच असायची. संध्याकाळ झाली. शंभू महादेव खांबास घट्ट बांधून ठेवलेले
 
होते. स्वाभीमानाने तळपत झळकणार्‍या तेजस्वी योग्यासारखे. ज्यांच्या तेजाने
 
शेशही डळमळून जावा अशा तेजस्वी श्रीकृष्णासारखे. अविचल. अभेद्य ! आभाळात
 
अभिमानाने मस्तक उंचावून बाणेदारपणे उभे असलेल्या रायगडाच्या टकमक टोकासारखे.

 
दोन दैत्य पुढे सरसावले. एकाने पाठीच्या वरच्या मणक्यापासून आणि दुसर्‍याने
 
समोरून गळ्यापासून शंभूराजांच्या अंगात वाघनख्या घुसवल्या. त्या राक्षसांना जोर
 
चढावा म्हणून कुराणातील आयते वाचले जात होते. रण वाद्यांचा दणदणाट होत होता.
 "
दीन दीन" "अल्लाहो अकबर" च्या घोषात राजांची त्वचा डाळिंबाच्या टरफला सारखी
 
सोलली जात होती. जास्वंदीसारखा लाल बुंद देह यातनांनी तळमळत होता. रक्ता
 
मासाच्या चिंध्या होत होत्या. संपूर्ण देहाची चाळणी झाल्यावर मग फरशा व खांडे
 
पेलत दोन गाझी (धर्मेवीर) पुढे आले. त्या दोघांचेही हात पाय असे अवयव एक एक
 
करून तोडून टाकले. एकाने खांड्याचे धारधार पाते संभाजी राजांच्या मानेत घुसवले.
 
व हळू हळू कुराणातील आज्ञेप्रमाणे 'हलाल' करीत शिर चिरत धडावेगळे केले !!!

 
स्वातंत्र्य सुर्या आता तरी प्रसन्न हो. हिंदु धर्माच्या रक्षणार्थ एक तेजस्वी
 
राजा आज स्वातंत्र्य देवतेच्या वेदीवर आपली आहूती देत आहे. आता तरी प्रसन्न
 
हो......!!!

 (
संदर्भ:- संभाजी कादंबरीतून)

 
शंभूराजे आम्हाला माफ करा. ज्या धर्माच्या रक्षणार्थ तुम्ही स्वतःचे प्राण
 
वेचलेत त्याच धर्मातील अभागे आम्ही, तुमच्या स्मरणार्थ वढू तुळापूरास जात नाही.
 
तिथे तुमचे स्मरण करून साधी दोन फुलही वाहात नाही.

 
पण, मात्र त्या हलकट, नराधम "औरंगजेबाची" कबर आम्ही ईंमाने-इतबार जतन करतोय.
 
त्याच्या कबरेला कुण्या "हिंदू-द्रष्ट्यांने" कलंकित करू नये म्हणून खासे
 
आसणारे आमचे "पोलिस बळ" आम्ही तैनात करतो.

 
ज्या "स्वातंत्र्यवीर सावरकरांनी" या मातृभूमीसाठी सर्वस्व अर्पण केले,
 
त्यांचेच तैलचित्र आज आमच्याच सरकारी-कारभारी कचेर्‍यात लावण्यास मज्जाव होतो.

 
ज्या "हिंदूह्रुद्यसम्राट शिवाजी राजांनी" या औरंगजेबाचा अटकेपार बिमोड केला.
 
आज त्याच "शिवाजी राजांच्या" पराक्रमाची गाथा ईतिहासाच्या पुस्तकात आक्षेपहार्य
 
वाटू लागली आहे आमच्या शिक्षण श्रेष्ठींना.

 
इतकेच काय, भारतात संसदेवर हल्ला होतो, मुंबईत अमानुष बॉम्बस्फोट घडतात, अगदी
 
आमने-सामने चकमकी होतात. यात आमचे लाख-मोलाचे खंदे वीर आम्ही
 
गमावले....सर्वांचे पुरावे-आरावे मिळाले....लोकांनी आँखो-देखी कबुली दिली.

 
अफझल गुरूला फाशीची शिक्षा होऊन वर्षे उलटली, पण तो आजही साजूक तुपातली
 
बिर्यानी अगदी मख्खन मारके......पाची बोट चाटीत पुन्हा कारवायांची नांदी
 
खेळतोयच....

 
कसाब जिवंत पकडला, त्याला अनेकांनी आँखो-देखे पाहिले. पत्रकारांनी
 
बातम्यांमध्ये, दूरदर्शनवर तमाम जनतेस त्याचे काळेकृत्य दाखवले...आम्ही मिटक्या
 
मारीत पाहिलेही ...तरी सूद्धा आम्ही कोर्टात दावेच चालवतोय......,

 
आणि फार-फार तर काय आमच्या काही सच्च्या, निर्भिड, उज्वल वकिलांमार्फत फाशीची
 
शिक्षा झालीच तर हा सुद्धा आमच्या "हिजडया- राजकर्त्यांच्या" कुशीत बसून त्या
 
आदम अफझल गुरू सोबत बिर्यानीची लज्जत घेणार.....

 
आणि फाशीच्या शिक्षेनंतरही आमचीच जनता आमच्याच कायद्याला ताठ मानेन आव्हान
 
करतात.

 "
फाशीची शिक्षा देणार्‍या न्यायाधीशांचे खून पडतील"
 -
फारूक अब्दुल्ला, माजी मुख्यमंत्री, जम्मू आणि काश्मीर.

 "
भगवान बुद्ध, महावीर आणि महात्मा गांधींसारख्या शांति दुताच्या देशात फाशीची
 
शिक्षा असावी यापेक्षा दुर्भाग्य ते कोणते.......?




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